मर जाएंगे, पर सुधरेंगे नहीं ! एक वो रावण एक तुम रावण ।।

 मर जाएंगे, पर सुधरेंगे नहीं ! एक वो रावण एक तुम रावण ।।


बहुत लोग ऐसे होते हैं जिन्हें मरना स्वीकार्य होता हैं पर सही पथ पर चलना नहीं वहीं होते हैं समाज के असली रावण ।।

एक वो रावण एक तुम रावण


रावण भी जनता था कि वो गलत था, और उसने कई बार स्वीकार्य भी किया था, की मैं जानता हूँ कि मैं गलत हूँ,  कभी मंदोदरी के समक्ष, कभी अपने भाई के समक्ष, कभी अपने पुत्र के समक्ष।


उसी प्रकार समाज के रावण भी जानते है कि वो गलत है कि आज जो वो घूसखोरी, लूट दूसरे के हक को मारना जैसी चीजें कर रहे है वो सब गलत हैं और उन्होंने उसे स्वीकार्य भी कई बार किया है कभी अपनी पत्नी के समक्ष और कभी अपने पुत्र और बन्धु के समक्ष लेकिन फिर भी वो मानने को तैयार नही की उन्हें कोई गलत कहें ।


उस रावण ने कहाँ की मैं जानता हूँ कि किसी की भार्या का अपहरण करना गलत हैं, उसी प्रकार किसी दूसरे का हक खा जाना भी गलत है लेकिन क्या मैंने जो किया सो किया..मैं तो ऐसा ही हूँ। 


वो जानता था कि इस अधर्म से उसके कुल का विनाश हो जाना है, उसे वह भी स्वीकार्य था बस उसे सुधरना नही स्वीकार्य था।


वह देख रहा है कि यह जो भी उसके साथ घट रहा यह उसी गलत का परिणाम है लेकिन वह उसे स्वीकार्य था ।


उस रावण को लगता था कि लंकावासी उसकी इज्जत करते है, और इस रावण को लगता है कि समाज मे उसकी इज्जत हैं ।


हो ना हो कल सवाल होंगे वो कोई आपका अपना करेंगा क्योकि कभी ना कभी भगवान भी प्रहलाद के रूप में अवतरित उसी कुल में हुए जिस कुल में हिरणाकश्यप था। 


आपके भी कुल में कोई आएगा शायद आपके जीते जी या आपके जाने के बाद फिर जब उसे समाज आपकी किए बखानों से नवाजे गा तो सवाल भी आप पर करेगा और बचता भी आपके नाम से फिरेगा,वह कभी आपका खून होते हुए भी आपके नाम को स्वंय के नाम के साथ जोड़ना नही चाहेगा ।


फिर आप मानोगे की आप गलत थे या तो जीते जी या फिर आपकी पंचतत्व में विलीन आत्मा, फिर आप खुद को धुत्कारों के की तुमने क्या किया ।।


समाज को तोड़ना छोड़िये, एक बन्धन में बांध कर पियोइये ।


कल आपका कुल को बिना उसकी कृति के चार लोगों के बीच कुर्सी मिलेगी सिर्फ आपके कृति से जो आज आप अपने समाज के लिए कुछ कर चले तो ।


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आपके प्यार और स्नेह के लिए धन्यवाद mithilatak के साथ बने रहे |

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