सफेद चादर leena jha के कलम से..



आज फिर जी किया
बिछाऊँ सफेद चादर छत पर
तेरे बांहों का सिरहाना बना
गिनुं मैं तारों को और
तु सुलझाये मेरे गेशू को
आज फिर जी किया

बैठूं तेरे पहलू में और
तु बातें करे जमाने की बेमुरव्वती की
मैं निहारती रहूं तुझे चुपचाप
और कोसती रहूँ इस जमाने को
आज फिर जी किया

तु ले हथेलियां अपने हाथों में
फेरे उंगलियां मेरे लकीरों पर
और बदल दे मेरी तकदीर अपने तकदीर से
आज फिर जी किया

तु कहे चंद नज़्ममेरी तारीफ में
मैं हो जाऊं तेरी मल्लिका
तु खींचे लकीर काजल की
वो बन जाये लक्ष्मण रेखा जमाने की
आज फिर जी किया

तु बुलाये मुझे निलोफर
सजा दे राह फूलों से
चुरा ले जमाने से
और कह दे जमाने से
मैं तेरी हूं सिर्फ़ तुम्हारी
आज फिर जी किया...

Leena jha के कलम से ...

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